मध्य प्रदेश में विकास का सच

मध्य प्रदेश में विकास का सच

२ विफल मुख्यमंत्री (उमा भारती एवं बाबूलाल ग़ौर) के पश्चात २००५ में जब मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान को मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया तब मध्य प्रदेश में आशा की एक की किरण जागी थी, जनमानस को विकास कीआशा थी, युवाओं को रोजगार की आशा थी, परिवारों को सुरक्षा की आशा थी. आशा थी की मध्य प्रदेश का कर्ज कुछ कम होगा, किसानों के कर्ज में कमी आएगी, भ्रष्टाचार में कमी आएगी, आइए देखते हैं परिणाम क्या हुआ?

भ्रष्टाचार : निराश्रित पेंशन घोटाले से ले कर, शौचालय घोटाला, सिंहस्थ घोटाले समेत अनेकों घोटालों के दाग मध्य प्रदेश सरकार पर हैं, मगर हद तो तब हो गयी जब डम्पर घोटाला सहित देश से सबसे घृणित घोटाला व्यापम घोटाले के छींटे स्वयं शिवराज सिंह चौहान पर लगे मगर न तो मुख्य मंत्री के खिलाफ कोई मामला दर्ज हुआ और न की कार्यवाही, इसीलिए प्रदेश को दूसरे सबसे भ्रष्ट प्रदेश का तमगा प्राप्त है।

मध्य प्रदेश में आज हर रहवासी पर १४ हजार रुपये से अधिक का कर्ज है , २००३ में मध्य प्रदेश पर २५००० करोड़ का क़र्ज़ था अब १,५०,००० करोड़ का क़र्ज़ हो गया यानि कि १३ वर्ष में ६ गुना कर्ज बढ़ गया ! आखिर ये कर्ज क्यों? जबकि मध्य प्रदेश देश के सबसे अधिक टैक्स वाले प्रदेशों में से एक है? यही नहीं, इतना कर्ज होने के बावजूद प्रदेश में लगातार बेरोजगारी चरम पर है.

मध्य प्रदेश को सर्वाधिक अपराध वाले प्रदेश का दर्जा मिला ही है, साथ में मध्य प्रदेश देश में सबसे अधिक बलात्कार वाला प्रदेश है, सबसे अधिक अपहरण वाला प्रदेश है, सबसे अधिक महिला अपराध वाला प्रदेश है

प्रदेश शिक्षा में सबसे नीचे की पायदान पर है, इसके बावजूद प्रदेश में निजी शिक्षण संस्थान खुलते है और शासकीय संस्थान का स्तर दिन प्रतिदिन गिरता जा रहा है

कुपोषण, किसान आत्महत्या, ग्रामीण क्षेत्रों में सडक सभी की स्थिति दयनीय है. परन्तु विडम्बना तो देखिये प्रदेश के मुखिया प्रदेश की चिंता करने की बजाय प्रमुख अखबारों के मुख्य पृष्ट पर मिथ्या उपलब्धि का बखान करते है. सचमुच भारत में लोकतंत्र अत्यंत अपरिपक्व है.

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